आमन्त्रण : विश्वम्भरा :”संस्कृत और संस्कृति” :वार्षिक अधिवेशन : 12 नव. को

भारतीय जीवनमूल्यों के लिए समर्पित साहित्यिक,सामाजिक,सांस्कृतिक  संस्था “विश्वम्भरा का वार्षिकोत्सव 12 नव. 2008 बुधवार को सायं  (ठीक 5 बजे) गगन विहार, नामपल्ली स्थित आ.प्र. हिन्दी अकादमी के सभाकक्ष में संपन्न होगा।

इस अवसर पर संस्था के मानद मुख्य संरक्षक डॊ. सी. नारायण रेड्डी ( ज्ञानपीठ सम्मान गृहीता,पद्मभूषण) उपस्थित रहेंगे तथा  सीफ़ेल (अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय ) के रूसी विभाग के आचार्य डॊ. जगदीश प्रसाद डिमरी “संस्कृत और संस्कृति” विषय पर “विश्वम्भरा-स्थापनादिवस व्याख्यान” देंगे। समारोह की अध्यक्षता  “स्वतन्त्र वार्ता” के सम्पादक डॊ. राधेश्याम शुक्ल करेंगे। मुख्य अतिथि के रूप में आ.प्र. हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री डॊ. यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद तथा विशेष अतिथि के रूप में प्रसिद्ध चित्रकार एवं कलासंग्राहक पद्मश्री जगदीश मित्तल आसन ग्रहण करेंगे। इस अवसर पर विशेष रूप से भाग लेने के लिए जबलपुर से  नगर पधार रहे कवि समीक्षक आनन्द कृष्ण भी संस्था का आतिथ्य ग्रहण करेंगे।

विश्वम्भरा की संस्थापक महासचिव डॊ. कविता वाचक्नवी ने  सभी साहित्य व संस्कृतिप्रेमियों को  इस अवसर पर आमन्त्रण व उपस्थित रहने का अनुरोध किया है ।

वार्षिकी : अनुरोध


हिन्दी भारत समूह को आरम्भ हुए आज २३ अक्तूब को पूरा एक वर्ष हो गया । इसके इस कार्यकाल को समूह के साथियों की उपस्थिति ने अत्यन्त जीवन्त व प्राणवान् बनाए रखा है।

मैं एक वर्ष के अतीत में आज देखती हूँ तो वे कुछ दिन स्मरण हो आते हैं जब इसके गठन के लिए मूल चिन्ताओं से व्यग्र हो यह प्रयास आरम्भ किया था। भविष्य में देखती हूँ तो आने वाले समय के लिए बहुत -सी सुखद कल्पनाओं से भर जाती हूँ। किसी भी संस्था अथवा संगठन का अस्तित्व उसके बने रहने मात्र में नहीं निहित होता अपितु प्रकारान्तर में उसके मन्तव्यों के सफलीभूत होने में निहित रहता है। जैसे जैसे सामूहिक चिन्ताओं पर सामूहिक सम्वाद की स्थितियाँ बनती हैं तैसे तैसे उनके निराकरण की दिशाएँ व मार्ग भी प्रशस्त होने की सम्भावनाएँ प्रबल होती चली जाती हैं। यों होना तो उस से अधिक चाहिए, अपेक्षित भी होता है किन्तु यही क्या कम हर्ष का विषय है कि किसी मुद्दे को लेकर कम से कम देश दुनिया में रहने वाले कुछ मुट्ठीभर लोग तो एकत्र हुए! बस, इसी सामूहिकता के बूते बड़ी बड़ी सुलझनें भी पा ही ली जा सकती हैं; आशा बल देती है.

अस्तु! इस प्रथम वर्षगाँठ को वार्षिक अधिवेशन के रूप में २५ अक्टूबर, शनिवार को नेट पर एक सामूहिक चर्चा के माध्यम से सम्पन्न करने का विचार बन रहा है। यदि आप में से कोई नया विचार सु्झाएँ तो उसका भी स्वागत है। इसे भारतीय समय से रात्रि बजे व यूके (लंदन समय) .३० बजे दोपहर को आरम्भ करने की योजना है ; लगभग दो घंटे का कार्यक्रम रहेगा । इसे याहू के मैसेंजर के माध्यम से चित्र व ध्वनि-कॊन्फ़्रेन्सिंग के रूप में सम्पन्न किया जाएगा । जिसमें एक हेडफ़ोन ( माईक सहित) की आवश्यकता होगी। परिचर्चा को सम्बोधित करने के लिए ३-४ वक्ताओं की अभी योजना है, जो १५1 मिनट हमें सम्बोधित करेंगे। शेष एक घंटा हम परस्पर सम्वाद का सुख लेंगे। (- यह अभी तक ऐसी इच्छा है।) आप सभी किसी भी प्रकार का सुझाव देना चाहें तो स्वागत है। तुरत प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा है। नेट पर भाषा, संस्कृति, सामाजिक प्रश्न व साहित्य आदि में रुचि रखने वालों से निवेदन है की अपनी उपस्थिति से इसे सफल व सार्थक बनाएँ | इसा खुले मंच पर सभी का स्वागत कर हर्ष होगा |

इसके तकनीकी पक्ष के लिए नीचे दी गई जानकारी देखें –
विस्तृत जानकारी

सामूहिक चर्चा में भाग लेने के लिये :
  1. आप को याहू id और याहू मेसेन्जर सौफ़्ट्वेयर की ज़रूरत होगी । यदि आप के पास याहू id नहीं है तो एक नया id बनायें । याहू मेसेन्ज़र सौफ़्ट्वेयर यहाँ उपलब्ध है , download करें और स्थापित करें http://messenger.yahoo.com/
  2. याहू मेसेन्ज़र पर logon करें (याहू id का प्रयोग करते हुए).
  3. याहू मेसेन्ज़र में Contacts और फ़िर Add a Contact पर click करें | email address की जगह bharathindi@yahoo.co.uk टाइप करें और next पर Click करें । एक बार फ़िर next पर Click करें और फ़िर finish पर ।
  4. निर्धारित समय (भारतीय समय रात बजे, न्यूयार्क समय सुबह ११:३० बजे लन्दन समय दोपहर .३० बजे) याहू मेसेन्ज़र पर logon करें । आप को एक Conference Call में शामिल होने का निमंत्रण मिलेगा , उसे स्वीकार करें ।
  5. Chat Window में आवाज के लिये Call और यदि आप के पास web camera है तो webcam पर Click करें ।
  6. आप को आवाज़ सुनने के लिये speakers और बोलने के लिये Microphone की ज़रूरत होगी । यदि आप के पास headphone है तो वह speaker और Microphone दोनों का काम कर सकते हैं। यदि आप के पास web camera है तो और लोग आप को देख सकेंगें ।
  7. पूर्व में इस तरह के प्रयोग में देखा गया था कि यदि आप के पास Vista Operating Systsem है तो आप को शायद Conference call में न जोड़ा जा सके ।
  8. वार्ता शनिवार को करना तय हुआ है । इस की तैयारी के लिये शुक्रवार को ठीक उसी समय एक प्रयोग किया जा सकता है ।
  9. यदि आप के पास कोई प्रश्न हो तो इस ब्लॉग पर टिप्पणी के रूप में लिखें। यदि अपना ईमेल यहाँ न देना चाहें तो आपको उत्तर भी यहीं प्राप्त होगा ।
  10. जो इस कार्यक्रम में भाग लेना चाहते हैं, वे Yahoo Messenger पर जा कर bharathindi@yahoo.co.uk को अपने Contacts में जोड़े या bharathindi@yahoo.co.uk पर एक पत्र भेजें ।


– आप सभी की उपस्थिति प्रार्थित है |




Posted By कविता वाचक्नवी to Beyond The Second Sex (स्त्रीविमर्श) at 10/22/2008 09:58:00 PM

–  कविता वाचक्नवी
http://streevimarsh.blogspot.com
http://oldiezgold.blogspot.com
http://bloggerbusti.blogspot.com
http://hindibharat.blogspot.com
http://360.yahoo.com/kvachaknavee
http://kvachaknavee.spaces.live.com
http://vaagartha.blogspot.com
http://balsabhaa.blogspot.com
https://kvachaknavee.wordpress.com/
http://sandarshan.blogspot.com
http://kvachaknavee.webs.com
http://groups.yahoo.com/group/HINDI-BHARAT/

हिन्दी अकादमी में कविसम्मेलन सम्पन्न

कई बरसों से मृतप्राय व बन्द पड़ी हिन्दी अकादमी को जीजान लगा प्रदेश में पुन: क्रियाशील बनाया गया। अब यह नियमित कार्य करने की दिशा में बढ़ती दिखाई देती है। इस अपने कार्यकाल के उसके पहले हिन्दी कार्यक्रम के रूप में कविसम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें काव्यपाठ के लिए अकादमी से गत माह ही आमंत्रण आया था। ५ लोगों को काव्यपाठ करना था। कार्यक्रम बहुत बढ़िया रहा। श्रोताओं का उत्साह तो देखने योग्य था ही, हमें भी अपार आनन्द मिला क्योंकि प्रत्येक कवि को पर्याप्त सुनाने का अवसर मिला। कार्यक्रम ३ घंटे चला।

बस समस्या एक ही रही कि ऐन मौके पर संस्था की लिफ़्ट ने धोखा दिया व ८वें तल्ले पर स्थित हॊल में हमें सीढ़ियों से जाना पड़ा। उन्होंने उचित सत्कार आदि किया। हाँ, वापिसी में लिफ़्ट से ही उतरे (तब तक ठीक हो चुकी थी).

उसी कार्यक्रम की केवल नमोल्लेख वाली रपट दो दैनिकों ने यहाँ अगले दिन प्रकाशित की। जिसे स्मृति के रूप में मैंने यहाँ सहेज लिया है।

मुझे तो पहचान ही जाएँगे — मंच पर इकलौती महिला हूँ….. हे हे हे….

जो रचनाएँ वहाँ पढ़ी थीं, उनमें से एक मुक्तक यह भी था –

समय के साथ यादों के घरौंदे कम नहीं होते

हमारे साथ रोई रात तारे नम नहीं होते

किसी झूठी हँसी पर लाख मोती वारने वालो

जहाँ विश्वास होता है वहाँ फिर भ्रम नहीं होते

 

 


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

पंचम् ‘ विश्वम्भरा ’ स्थापनादिवस समारोह सम्पन्न

— पंचम् ‘ विश्वम्भरा ’ स्थापनादिवस समारोह सम्पन्न–

———————————-

१ दिसम्बर २००७


भारतीय जीवनमूल्यों के प्रचार-प्रसार की संस्था ‘विश्वम्भरा’ की पाँचवीं वर्षगाँठ के अवसर पर यहाँ खैरताबाद स्थित दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के सम्मेलन-कक्ष में ‘विश्वम्भरा-स्थापनादिवस-समारोह’ विख्यात कलासमीक्षक पद्मश्री जगदीश मित्तल की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।

इस अवसर पर ‘ भारतीय मूल्यचिन्तन ’ पर पाँचवाँ ‘विश्वम्भरा स्थापना दिवस व्याख्यान’ देते हुए प्रसिद्ध भारतविद् डॊ.सुनीति शास्त्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति की मूल चिन्ता संस्कारशील मनुष्य का निर्माण व मूल्याधारित समाज की स्थापना करना है। उन्होंने भारतीय संस्कृति को सामूहिकता, सौहार्द और त्याग जैसे मूल्यों से निर्मित संस्कृति की संज्ञा दी और कहा कि आज की धन और भोग पर आधारित जड़वादी सभ्यता मनुष्य और मनुष्य के बीच उदारता की संभावनाऒं को नष्ट कर रही है। डॊ. सुनीति शास्त्री ने जोर देकर कहा कि मनुष्य और मनुष्य के बीच आत्मीयता और प्रेम का संबंध स्थापित करना ही भारतीयता का सम्पूर्ण विश्व को मूलभूत सन्देश हो सकता है। डॊ. शास्त्री ने इस बात पर अफ़सोस जाहिर किया कि स्वतन्त्रता के बाद भारत में मूल्यशिक्षा का निरन्तर पतन हुआ है। उन्होंने उपस्थित बुद्धिजीवियों तथा साहित्य व संस्कृतिप्रेमियों का आह्वान किया कि वे यदि आने वाली पीढ़ियों को सचमुच सुन्दर भविष्य देना चाहते हैं तो उसे मनुष्य बनने की शिक्षा दें – ऐसा मनुष्य जो जड़वाद का विरोध कर सके और जिसमें देवत्व की संभावनाएँ निहित हों । डॊ. सुनीति शास्त्री ने इस तथ्य की ओर खास ध्यान दिलाया कि भारतीय संस्कृति वास्तव में उन मूल्यों के पुंज का नाम है जो मनुष्य के भीतर छिपी देवत्व की संभावनाओं को साकार कर सकता है।

‘ विश्वम्भरा’ के मानद मुख्य संरक्षक पद्मभूषण डॊ. सी. नारायण रेड्डी ( ज्ञानपीठ पुरस्कार ग्रहीता भूतपूर्व राज्यसभा सदस्य ) ने संस्कृति और भाषा के परस्पर सम्बन्ध की चर्चा करते हुए यह कहा कि मातृभाषाओं की उपेक्षा की प्रवृत्ति के कारण हिन्दी और तेलुगु सहित सभी भारतीय भाषाओं के बोलने वालों की संख्या घटती जा रही है, जो बहुत खतरनाक संकेत है। उन्होंने कहा कि संस्कृति और मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए हमें अपनी भाषाओं को सुरक्षित और सुदृढ़ बनाने के लिए पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। डॊ. सीनारे ने प्रस्ताव रखा कि ‘विश्वम्भरा’ निकट भविष्य में भारतीय भाषाओं के इस संकट पर केन्द्रित संगोष्ठी का आयोजन करे।

समारोह के अध्यक्ष पद्मश्री जगदीश मित्तल ( ‘कल्पना’ के कला सम्पादक) ने ‘विश्वम्भरा स्थापनादिवस व्याख्यानमाला’ को अत्यन्त व्यावहारिक बताते हुए अपने सम्बोधन में कहा कि संस्कृति-संरक्षण के लिए अभी तक देशवासियों ने आधुनिक सन्दर्भों में भारतीय भाषाओं और विशेष रूप से हिन्दी की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया है। उन्होंने इस बात पर चिन्ता प्रकट की कि स्वतन्त्रता के बाद अभी तक भी भारत सरकार की कोई सुस्पष्ट कला-साहित्य- संस्कृति की नीति नहीं है, जिसके कारण नई पीढ़ी अपनी धरोहर,परम्परा और उसमें निहित उदात्त जीवनमूल्यों के सम्बन्ध में अशिक्षित व भ्रमित है। श्री मित्तल ने कहा कि श्रेष्ठ जीवनमूल्य अपने आनंद को सबके आनंद के रूप में वितरित करने में निहित है और ऐसी उदार मानसिकता पैदा करने के लिए ‘विश्वम्भरा’ को एक आंदोलन का रूप देना आवश्यक है।

विशेष अतिथि प्रो. एम. वेकटेश्वर ने अपने सम्बोधन में भारत में जीवनमूल्य केन्द्रित एक और नवजागरण की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि ईमानदारी, निष्ठा, आस्था, कर्तव्यबोध तथा शिष्टाचार जैसे मूल्यों की आज पुन: नए सिरे से व्याख्या करने की आवश्यकता है ताकि अर्थकेन्द्रित जड़वाद के आक्रमण का सामना किया जा सके।

दैनिक ‘स्वतन्त्रवार्ता’ के सम्पादक डॊ. राधेश्याम शुक्ल ने इस अवसर पर विशेष अतिथि के रूप में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि स्वतन्त्रता के बाद राजनेताओं और बुद्धिजीवियों ने संस्कृति की संकल्पना की अत्यन्त भ्रामक व्याख्या प्रस्तुत की है, जिसके परिणामस्वरूप अनेक प्रकार की क्षेत्रीय मूढ़ताओं के कारण भारतीय जीवनमूल्यों की आभा को धुँधलाने के प्रयास भी हुए हैं। डॊ. शुक्ल ने आगे कहा कि शिक्षा के माध्यम और सम्पर्क भाषा के रूप में जब तक हिन्दी पूरे भारत में व्यावहारिक रूप में स्थापित नहीं होगी, तब तक संस्कृति और मूल्यों के प्रचार को पूरा नहीं माना जा सकता।

कार्यक्रम के अन्त में संस्था की महासचिव डॊ. कविता वाचक्नवी ने ‘विश्वम्भरा’ के उद्देश्यों व गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए छात्रों, अध्यापकों, लेखकों, और भाषाप्रेमियों के बीच किए गए संस्था के अब तक के रचनात्मक कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि कम्प्यूटर और इन्टरनेट पर देवनागरी के प्रयोग के सम्बन्ध में विकसित संसाधनों के पैकेज के प्रयोग के सम्बन्ध में किसी भी प्रकार की सहायता का कोई भी लाभ उठा सकता है, संस्था अपनी सेवाएँ देने को सदैव तत्पर है।

समारोह में बौद्धिक विमर्श के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी सम्पन्न हुआ। गायक कलाकार पी. माधवी, बी. बालाजी, और यामिनीचरण ने संस्कृत, तेलुगु और हिन्दी भाषा के राष्ट्रीयता और संस्कृति विषयक गीतों की सस्वर प्रस्तुति से समाँ बाँध दिया । सामूहिक दीपप्रज्वलन द्वारा उद्घाटन के अनन्तर चन्द्रमौलेश्वर प्रसाद( कोषाध्यक्ष), डॊ. रामकुमारतिवारी(संरक्षक, निदेशक- निर्दोष सोशलसर्विसेज् सोसायटी, डेक्कन बैंक, निर्दोष इन्वेस्टमेंट्स) , द्वारका प्रसाद मायछ (संरक्षक) व गुरुदयाल अग्रवाल ने अतिथियों को शाल पहना कर सम्मनित किया। कलाकारों का सम्मान डॊ. सी. नारायण रेड्डी ने किया। मुख्य वक्ता डों सुनीति शास्त्री को ‘ विश्वम्भरा ’ की ओर से विशेष सम्मान के रूप में स्मृतिचिह्न भी भेंट किया गया।

इस अवसर पर डॊ. जे.वी. कुलकर्णी, डॊ. प्रभाकर त्रिपाठी, डॊ. किशोरीलाल व्यास, डॊ. रेखा शर्मा, एफ़.एम. सलीम, वसन्तजीत हरचन्द, सत्यादेवी हरचन्द, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, पवित्रा अग्रवाल, वीरप्रकाश लाहोटी सावन, तेजराज जैन, सुषमा बैद, बलवीर सिंह, सुचित्रा चन्द्र, चवाकुल नरसिंह मूर्ति, श्री निवास सोमाणी, आशा देवी सोमाणी, के. नागेश्वर राव, श्रीनिवास, माधवीसुत आदि ने भी विचार- विमर्श में सक्रिय भागीदारी की। डॊ. ऋषभदेव शर्मा ( प्रो. एवम् अध्यक्ष, पी.जी. एन्ड रिसर्च इन्स्टीट्यूट, विश्वविद्यालय विभाग, दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा) ने धन्यवाद ज्ञापित किया। मीडिया की ओर से आए ‘ई-टी.वी’., ‘डेली हिन्दी मिलाप’ व ‘स्वतन्त्रवार्ता’ के मीडियाकर्मियों के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित किया गया।

–( डॊ. कविता वाचक्नवी)

महासचिव- ‘विश्वम्भरा’

1 दिसम्बर 2007

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.